Happy Doctor’s Day

Doctor जिनकी 9 साल में हो गई थी शादी, भारत की वो पहली महिला डॉक्टर- जानिए इनके बारे में –

आज यानी 01 जुलाई को नेशनल डॉक्टर्स डे है। कोरोना जैसी महामारी के बीच डॉक्टरों की भूमिका वाकई नायकों की तरह है। कहते हैं डॉक्टर्स भगवान का दूसरा रूप होते हैं। कोरोना संकट के दौर में जिस तरह देशभर के डॉक्टर्स दिन-रात मरीजों की सेवा में लगे हुए हैं, यह बात उनके लिए सटीक बैठती है। कोरोना संकट के इस दौरान में ना सिर्फ पुरूष बल्कि कई महिला डॉक्टर्स भी अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई है। मगर, एक समय ऐसा भी था जब महिलाओं को डॉक्टरी तो क्या स्कूली पढ़ाई करने भी नहीं दिया था। ऐसे में महिलाओं के लिए रोशनी बनकर उभरी थी देश की पहली महिला डॉक्टर आनंदीबाई जोशी।

हम डॉक्टर्स डे के मौके पर देश की पहली महिला डॉक्टर आनंदी गोपाल जोशी को याद कर रहे हैं। जो तब देश में डॉक्टर बनकर विदेश से लौटी थीं, जब देश में महिलाओं की पढ़ाई-लिखाई नहीं होती थी। इस पहली महिला डॉक्टर का नाम आनंदी गोपाल जोशी था, जिनके जीवन की कहानी दिल को छू लेने वाली है। आनंदी की शादी केवल 09 साल की उम्र में हो गई। उनका घर बहुत रुढ़िवादी था। ब्याह के बाद उनका नाम आनंदी गोपाल जोशी पड़ा।

पुणे में ब्राह्मण परिवार में जन्मी आनंदीबाई जोशी की शादी 09 साल की उम्र में करीब 25 साल के गोपालराव जोशी से हुई थी। आनंदी जोशी की जीवनी संवाद प्रकाशन ने प्रकाशित की है। जिसमें उनके जीवन संघर्ष और समाज की रुढियों को तोड़ते हुए आगे बढ़ने की कहानी है। बता दें कि ये जीवनी मराठी उपन्यासकार श्री। ज. जोशी ने लिखी है। जिसका हिन्दी में अनुवाद हुआ है। ज. जोशी उपन्यास में लिखते हैं, गोपालराव की आनंदी से शादी की शर्त ही यही थी कि वे पढ़ाई करेंगी। आनंदी के मायके वाले भी उनकी पढ़ाई के ख़िलाफ थे। ब्याह के वक्त आनंदी को अक्षर ज्ञान भी नहीं था। गोपाल ने उन्हें क,ख,ग से पढ़ाया। बताते चलें कि नन्ही सी आनंदी को पढ़ाई से खास लगाव नहीं था। मिथक थे कि जो औरत पढ़ती है उसका पति मर जाता है। आनंदी को गोपाल डांट-डपट कर पढ़ाते। एक दफा उन्होंने आनंदी को डांटते हुए कहा, तुम नहीं पढ़ोगी तो मैं अपना मज़हब बदलकर क्रिस्तानी बन जाऊंगा।

ज. जोशी ने लिखा, अक्षर ज्ञान के बाद गोपाल, आनंदी के लिए अगली कक्षा की किताबें लाए। फिर वे कुछ दिन के लिए शहर से बाहर चले गए। जब वापस लौटे तो देखा कि आनंदी घर में खेल रही थी। वे गुस्से से बोले कि तुम पढ़ नहीं रही हो। आनंदी ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, जितनी किताबें थी सब पढ़ चुकी।

जीवन में लगे एक बड़े झटके ने भी उन्हें डॉक्टर बनने के लिए प्रेरित किया। जब वो 14 साल की थीं। तब मां बनीं। लेकिन केवल 10 दिनों में उन्होंने अपनी नवजात संतान को खो दिया। ये उनके लिए बड़ा आघात था। तब उन्‍होंने यह प्रण किया कि वह एक दिन डॉक्‍टर बनेंगी। ऐसी असमय मौत को रोकने की कोशिश करेंगी। बेशक उनके पति ने उनका इस मामले में लगातार साथ दिया। उस समय एक विवाहित महिला के लिए अमेरिका जाकर पढ़ाई करना बहुत मुश्किल था। समाज की आलोचनाओं और रुढियों से विचलित हुए बगैर वो अमेरिका गईं। वहां पढ़ाई की। आनंदीबाई ने कोलकाता से पानी के जहाज से न्यूयॉर्क की यात्रा की। उन्होंने पेंसिल्वेनिया की वूमन मेडिकल कॉलेज में चिकित्सा कार्यक्रम में भर्ती होने के लिए नामांकन किया, जो कि दुनिया में दूसरा महिला चिकित्सा कार्यक्रम था।

आनंदीबाई ने साल 1886 में (19 साल की उम्र में) उन्होंने MD की डिग्री हासिल कर ली. वो एमडी की डिग्री पाने वाली और पहली भारतीय महिला डॉक्‍टर बनीं। 1886 के अंत में, आनंदीबाई भारत लौट आई, जहां उनका भव्य स्वागत हुआ। कोल्हापुर की रियासत ने उन्हें स्थानीय अल्बर्ट एडवर्ड अस्पताल की महिला वार्ड की चिकित्सक प्रभारी नियुक्त किया।
बता दें कि 26 फरवरी 1887 को आनंदीबाई की 22 साल की उम्र में तपेदिक से मृत्यु हो गई। 1888 में, अमेरिकी नारीवादी लेखक कैरोलिन वेल्स हीली डैल ने आनंदीबाई की जीवनी लिखी। डॉल आनंदीबाई से परिचित थीं। 2019 में, मराठी में उनके जीवन पर एक फिल्म आनंदी गोपाल नाम से भी बनाई गई।

 

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